
मैं कोई सायर नहीं ,
ना मैं कोई रचनेवाला रचेता हूँ !!
मेरे शब्द कीसी सायर की सायरी नहीं ,
कीसी ग़ालिब की ग़ज़ल नहीं ,
मेरी लीखावट कीसी कीताब की नक़ल नहीं!!
ये तो मेरे गुजरे हुए कल की ,
दर्द -इ -नुमा पन्नों के पहलूँ है !!
इसे कीसी कवी की कविता ना शमझ बैठना ,
इसे कीसी सायर की सायरी ना शमझ बैठना ,
ये तो मेरे तेरी चाहत की नीशानी है !!
मैंने हर एक शब्द को अपने दील से उतरा है ,
एक एक शब्द को तेरी इंतेजार की धुप से सीचा है ,
इसे सीर्फ शब्द ना शमझ ना !
इसमें तेरी चाहत का दर्द है ,
दील से शमझ्ना, इसके हर शब्द को ,
दील से लगा कर महशुस करना हर शब्द को!!
तुझे मेरे दीवानेपन की एह्स्सास होगा ,
ऐ दीवानों की दील की आवाज़ है,
दील से महसूस करना इस शब्द को !!
ऐ ओ दीवानेपन के दर्दे शाम की शब्द हैं,
जो तुझे भी दीवाना कर देंगे, दर्दे उस शाम के !!
इसे सीर्फ ग़ालिब की ग़जल मत शम्झ्ना!
मैं कोई ग़ालिब नहीं,
ऐ कोई ग़जल नहीं !!
मैं कोई शयर नहीं
ऐ कोई सायरी नहीं !!
मैं कोई लेखक नहीं
ऐ कोई कहानी नहीं !!
मैं तो दीवाना हूँ , तेरी चाहत का ,
और ऐ शब्द मेरी दीवानगी की नीशानी!!!
आ तू भी बन जा दीवाना,
साथ दे मेरे दीवानेपन को!!
मैं कोई ग़ालिब नहीं ,
ये कोई ग़ज़ल नहीं !!!
!!!.........Mishra....!!!